What is the TRUTH About Porn Videos?

By Sexologist Delhi

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मुख्य अवधारणाएँ:

  • पॉर्न का कल सच (पॉर्न का झूठा सच)
  • सेक्स एजुकेशन की कमी (यौन शिक्षा का अभाव)
  • आर्टिफिशियल पेनिस (कृत्रिम लिंग)
  • कैमरा एंगल (कैमरा कोण)
  • एडिटिंग (संपादन)
  • टेक-रीटेक (कई बार फिल्माना)
  • आर्टिफिशियल सीमन (कृत्रिम वीर्य)
  • सपोर्टिंग आर्टिस्ट (सहायक कलाकार)
  • स्क्वार्टिंग (महिला द्वारा तरल पदार्थ का निकलना)
  • पेनिस फ्रैक्चर (लिंग का फ्रैक्चर)
  • डे टू डे लाइफ (दैनिक जीवन)

पॉर्न और वास्तविक जीवन में यौन संबंध का अंतर

यह वीडियो डॉ. अली द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जो पिछले 26 सालों से दिल्ली में यौन समस्याओं का इलाज कर रहे हैं। उनका उद्देश्य कम से कम दवाइयों के साथ यौन समस्याओं को जड़ से खत्म करना है। वीडियो का मुख्य विषय पॉर्न फिल्मों में दिखाए जाने वाले दृश्यों और वास्तविक जीवन की यौन क्रियाओं के बीच के अंतर को उजागर करना है, जिसे "पॉर्न का कल सच" कहा गया है। मोबाइल फोन के व्यापक प्रसार ने पॉर्न की पहुँच को आसान बना दिया है, जिससे भारत में यौन शिक्षा की कमी के कारण लोगों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। युवा जिज्ञासावश पॉर्न देखते हैं और उसमें दिखाए गए दृश्यों को ही सच्चाई मान लेते हैं, जिससे उनकी यौन जीवन के प्रति अपेक्षाएँ अवास्तविक हो जाती हैं।

1. लिंग का आकार (पेनिस साइज)

  • पॉर्न में: बहुत लंबा लिंग दिखाया जाता है, जो अक्सर 6 से 7 इंच से भी अधिक होता है। यह कृत्रिम लिंग (आर्टिफिशियल पेनिस) का उपयोग करके, कैमरा एंगल से या एडिटिंग के माध्यम से बढ़ाया-चढ़ाकर दिखाया जाता है।
  • वास्तविकता में: भारतीय पुरुषों में लिंग का औसत आकार 5.5 इंच होता है। यदि यह 4.5 से 5.5 इंच के बीच है, तो इसे बिल्कुल सामान्य माना जाता है। किसी भी तुलना या नकारात्मक भावना की आवश्यकता नहीं है।

2. संभोग की अवधि (सेक्स टाइम)

  • पॉर्न में: 20-25 मिनट तक लगातार इन-आउट क्रिया दिखाई जाती है, जिसमें स्खलन नहीं होता और महिलाएँ तरह-तरह की आवाज़ें निकालती हैं। यह कई टेक-रीटेक और एडिटिंग का परिणाम होता है।
  • वास्तविकता में: वास्तविक जीवन में संभोग का औसत समय 5.5 मिनट (या लगभग 5 मिनट) होता है, जो पर्याप्त है। यदि दोनों पार्टनर 2-3 मिनट जैसे कम समय में भी संतुष्ट हैं, तो किसी इलाज की आवश्यकता नहीं होती।

3. वीर्य की मात्रा और रंग

  • पॉर्न में: अत्यधिक मात्रा में, एकदम सफेद वीर्य बहुत दूर तक निकलता हुआ दिखाया जाता है। यह अक्सर कृत्रिम वीर्य (आर्टिफिशियल सीमन) होता है, जिसमें पेंट या दूध मिलाकर दबाव से फेंका जाता है।
  • वास्तविकता में: सामान्य वीर्य की मात्रा लगभग एक चम्मच (1.5 मिलीलीटर) होती है, जो पर्याप्त है। वीर्य का रंग थोड़ा मटमैला या ग्रेइश हो सकता है, जो बिल्कुल सामान्य है।

4. महिला की आवाज़ें

  • पॉर्न में: महिलाएँ तरह-तरह की तेज़ आवाज़ें निकालती हुई दिखाई जाती हैं। ये आवाज़ें अक्सर सहायक कलाकारों (सपोर्टिंग आर्टिस्ट) द्वारा या बाद में एडिटिंग में जोड़ी जाती हैं, जो प्राकृतिक नहीं होतीं।
  • वास्तविकता में: भारतीय महिलाएँ आमतौर पर थोड़ी शर्मीली होती हैं। यदि वे ऐसी आवाज़ें नहीं निकालतीं या हल्की आवाज़ें निकालती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे आनंद नहीं ले रही हैं। घरेलू पार्टनर से ऐसी आवाज़ें निकालने की उम्मीद करना अनुचित है।

5. महिला द्वारा तरल पदार्थ का निकलना (स्क्वार्टिंग)

  • पॉर्न में: महिला से ढेर सारा पानी (पिचकारी जैसा) निकलता हुआ दिखाया जाता है, जिसे स्क्वार्टिंग कहते हैं। यह अक्सर नकली होता है, जैसे कोई नीचे से पिचकारी से पानी फेंक रहा हो।
  • वास्तविकता में: स्क्वार्टिंग कुछ महिलाओं में कभी-कभी होती है और यह बिल्कुल सामान्य है। यह तरल पदार्थ मूत्र जैसा होता है लेकिन इसमें न तो गंध होती है और न ही मूत्र का रंग, यह बिल्कुल रंगहीन होता है। इसका निकलना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है।

6. स्थान और स्थितियाँ

  • पॉर्न में: अलग-अलग और असामान्य स्थानों (जैसे रसोई, बाथरूम) पर और जटिल स्थितियों में यौन क्रियाएँ दिखाई जाती हैं, जिसमें पार्टनर को उठाना या ले जाना शामिल होता है।
  • वास्तविकता में: ये स्थितियाँ अव्यावहारिक और खतरनाक होती हैं। कलाकार प्रशिक्षित होते हैं और सेट पहले से तैयार होते हैं। ऐसी कोशिश करने से चोट लगने का खतरा होता है, जैसे लिंग का फ्रैक्चर (पेनिस फ्रैक्चर) या पैर फिसलने से हड्डी टूटना। इन दृश्यों से प्रेरित नहीं होना चाहिए।

7. ज़बरदस्ती या हिंसा

  • पॉर्न में: महिला के साथ ज़बरदस्ती करना, उसे मारना, बाल खींचना या थप्पड़ मारना जैसे कृत्य दिखाए जाते हैं, जो दर्शकों को अधिक उत्तेजित करने के लिए होते हैं।
  • वास्तविकता में: डे टू डे लाइफ में कोई भी महिला पार्टनर ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं करेगी। ऐसे कृत्य आपके संबंधों को खराब कर सकते हैं।

निष्कर्ष यह वीडियो स्पष्ट रूप से बताता है कि पॉर्न फिल्मों में जो कुछ भी दिखाया जाता है, वह बड़े पैमाने पर बनावटी, झूठा और अवास्तविक होता है। यह कृत्रिम उपकरणों, कैमरा ट्रिक्स, एडिटिंग और प्रशिक्षित कलाकारों का परिणाम होता है। इन "ब्लू फिल्मों" से प्रेरित होकर अपनी वैवाहिक या यौन जीवन को प्रभावित नहीं करना चाहिए। वास्तविक जीवन की अंतरंगता अपनी सामान्य सीमाओं में अलग और संतोषजनक होती है। वीडियो का मुख्य संदेश यह है कि दर्शकों को पॉर्न को सच्चाई नहीं मानना चाहिए और वास्तविक जीवन की यौन अपेक्षाओं को यथार्थवादी रखना चाहिए।

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