The Real Price You’re Paying for Cheap Meat

Suresh VyasAbout 5 min readAug 27, 2025Watch original
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सारांश

मुख्य अवधारणाएँ: पिंक रिवोल्यूशन, एनिमल बेस्ड फूड्स, सब्सिडी, हिडन कॉस्ट, सिन टैक्स, एंटीमाइक्रोबियल्स, एनवायरमेंटल कॉस्ट, हेल्थ केयर कॉस्ट, मीट टैक्स, प्लांट बेस्ड फूड्स।

1. परिचय:

वीडियो में दिल्ली में बैठी वर्तमान सरकार के "पिंक रिवोल्यूशन" के सपने पर सवाल उठाया गया है, जिसमें मांस के निर्यात को बढ़ावा दिया जा रहा है। वक्ता बताते हैं कि कैसे एनिमल बेस्ड फूड्स (मांस, अंडे, दूध) में बहुत अधिक रिसोर्सेस लगते हैं, फिर भी ये प्रोडक्ट्स सस्ते मिलते हैं। वीडियो में सरकारों द्वारा मांस, अंडे आदि के दाम को कम रखने के तरीकों और इन प्रोडक्ट्स की असली कीमत पर प्रकाश डाला गया है।

2. एनिमल बेस्ड फूड्स की वास्तविक सामाजिक लागत:

शराब के उदाहरण से समझाया गया है कि कैसे किसी प्रोडक्ट की वास्तविक लागत उसकी खुदरा कीमत से कहीं अधिक होती है। शराब से क्राइम रेट, रोड एक्सीडेंट्स और बीमारियों के कारण इकोनॉमिक लॉसेस होते हैं। 2019 की एक स्टडी के अनुसार, भारत में अल्कोहल का टोटल इकोनॉमिक कॉस्ट जीडीपी का 1.45% था, जो कि उस साल के टोटल हेल्थ एक्सपेंडिचर से भी ज्यादा था। इसी तरह, एनिमल बेस्ड फूड्स की भी हिडन कॉस्ट होती है, जिस पर हमारा ध्यान नहीं जाता क्योंकि वह कीमत या तो उस प्रोडक्ट में जोड़ी नहीं जाती या सरकार की सब्सिडीज की वजह से वह पैसा हम लोग ही टैक्स के रूप में भर रहे हैं।

3. सरकारी सहायता और सब्सिडी:

एनिमल प्रोडक्ट्स को कम दाम पर खरीदने का एक कारण गवर्नमेंट सपोर्ट और सब्सिडीज हैं। किसी भी एनिमल प्रोडक्ट को प्रोड्यूस करने के लिए पहले उस जानवर को कई किलो फीड खिलानी पड़ती है। एनिमल हस्बैंड में सब्सिडी जरूरी हो जाती है। दूध उद्योग में सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा जानवरों की फीड उगाने के लिए जाता है। फीड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स को सेटअप करने के लिए 90% तक के लोंस भी मिल रहे हैं, जिसमें केवल 3% की इंटरेस्ट रेट होती है। फार्म एनिमल्स के स्वास्थ्य के लिए उन्हें वैक्सीनेट करने के लिए सरकार की एक अलग से स्कीम है, नेशनल एनिमल डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम, जिसमें 5 सालों में सरकार का 13343 करोड़ खर्च करने का प्लान है। पोल्ट्री फार्म सेटअप करने और उसके इक्विपमेंट और मशीनरी में 50% तक की सब्सिडी उपलब्ध है। दूध, दूध से बने प्रोडक्ट्स, मास ये सब चीजें जीएसटी के अंदर भी नहीं आती।

4. सब्सिडी की तुलना:

अनाज, दाल, चावल में भी गवर्नमेंट फर्टिलाइजर्स या मशीनरी पर सब्सिडीज देती है, लेकिन वो सब्सिडीज उतनी वेस्टफुल नहीं हैं। फीड क्रॉप को सब्सिडाइज करने पर कई किलो सब्सिडाइज फीड क्रॉप खाने के बाद 1 किलो मास या 1 किलो दूध मिलता है। वहीं प्लांट बेस्ड फूड्स हम डायरेक्टली खा सकते हैं, तो इनकी सब्सिडी देने पर भी हमारा जो टोटल सब्सिडी बिल होता है वो कम होता है।

5. हेल्थ रिलेटेड कॉस्ट:

दुनिया में जितनी भी नई इनफेक्शियस डिजीज हो रही हैं, उनमें चार में से तीन बीमारियां जानवरों से आ रही हैं। बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू एनिमल एग्रीकल्चर के कारण हम तक पहुंची हैं। फार्म्स में रहने वाले जानवरों को बीमारियों से बचाने के लिए रेगुलरली एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। दुनिया भर में जितनी भी एंटीबायोटिक्स बनती हैं, उसमें से लगभग 70% केवल और केवल जानवरों पर इस्तेमाल की जाती है। इससे एंटीमाइक्रोबियल्स हैंस पैदा होती है। वर्ल्ड एनिमल प्रोटेक्शन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आज की तारीख में भी हर साल एंटीमाइक्रोबियल्स के कारण 10 लाख लोगों की मौत हो रही है और ग्लोबल इकॉनमी को हर साल 400 बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। एनिमल प्रोडक्ट कंसंट कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, स्ट्रोक, हार्ट डिजीज और कैंसर जैसी बीमारियों के रिस्क को भी बढ़ाता है। ऑक्सफोर्ड की एक स्टडी के मुताबिक, अगर हम 2050 तक मास खाना कम कर देते तो हर साल 50 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है।

6. एनवायरमेंटल कॉस्ट:

एनिमल एग्रीकल्चर भारी मात्रा में ग्रीन हाउस गैस एमिशंस, जंगलों के साफ होने, पानी बर्बाद होने और वाटर पोल्यूशन के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपियन यूनियन में एनिमल बेस्ड फूड्स के प्रोडक्शन से 1500 बिलियन यूरो से ज्यादा की एक्सटर्नलिटी या इनडायरेक्ट कॉस्ट जनरेट होती है। एफएओ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के एग्री फूड सिस्टम का असली कॉस्ट कम से कम 10 ट्रिलियन डॉलर्स है। दुनिया में सबसे ज्यादा हिडन कॉस्ट चाइना का है 2.4 ट्रिलियन डॉलर्स, उसके बाद है यूएसए 1.5 ट्रिलियन डॉलर्स और फिर है भारत 1.1 ट्रिलियन डॉलर्स।

7. सिन टैक्स:

एनिमल बेस्ड फूड्स को सब्सिडी देकर प्रमोट करना ना सिर्फ इकोनॉमिकली इनएफिशिएंट है बल्कि भविष्य के लिए बहुत खतरनाक भी है। अल्कोहल की तरह, एनिमल बेस्ड प्रोडक्ट्स पर भी सिन टैक्स लगाया जाना चाहिए। जर्मनी, डेनमार्क और स्वीडन के पार्लियामेंट में तो मीट टैक्स पर चर्चा भी हो चुकी है। 2016 में पहली बार ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की टीम के द्वारा मीट टैक्सेस का एक ग्लोबल एनालिसिस किया गया जिसमें कैलकुलेट किया गया कि बीफ पे 40%, दूध पे 20% और चिकन के मास पर 85% टैक्स की जरूरत है।

8. ऑप्टिमम फूड टैक्स स्ट्रक्चर:

गवर्नमेंट्स को जहां एक तरफ एनिमल बेस्ड प्रोडक्ट्स को टैक्स करना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ उस टैक्स से हेल्दी फूड्स जैसे फलों और सब्जियों पर सब्सिडी देनी चाहिए। इसी तरह का ऑप्टिमम टैक्स प्लान हर साल 1 बिलियन टन कार्बन एमिशंस को कम कर सकता है। नेदर जैंड्स में भी एक ऐसा ही कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस किया गया कि अगर हम अगले 30 साल में मास पे टैक्स लगा दें और फलों और सब्जियों पर सब्सिडी दे दें तो क्या होगा।

9. निष्कर्ष:

मीट और डेरी पे टैक्स लगाना और इनकी डिमांड को कम करना या प्लान बेस्ड फूड्स को प्रमोट करना इतना आसान काम नहीं है। सरकारों को इस बात को सीरियसली लेना चाहिए और एनिमल प्रोडक्ट से होने वाले भारी नुकसान से समाज को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।

उद्धरण:

  • "यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 10 साल पहले की स्पीच है और अब यह देखिए जिन नरेंद्र मोदी ने चुनाव में पिंक रेवोल्यूशन यानी भैंस के मीट के निर्यात का मुद्दा उछाला था, उनके 6 महीने के कार्यकाल में भैंस के मीट के निर्यात का कारोबार खूब फला-फूला है।"
  • "सिन टैक्स उन कमोडिटीज पर लगाया जाता है जो इंडिविजुअल या सोसाइटी के लिए नुकसानदायक हो सकती है।"
  • "शायद आज की तारीख में एनिमल एग्रीकल्चर से बड़ा सिन या पाप और कहीं नहीं है।"

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