अक्षरधाम मंदिर हमला: 24 सितंबर 2002
Key Concepts:
- अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमला
- तहरीक-ए-कसास, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद
- गुजरात दंगे
- एनएसजी (राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड)
- पोटा (आतंकवाद निवारण अधिनियम)
- जांच में खामियां
- न्यायिक प्रक्रिया
1. हमले की घटना और शुरुआती प्रतिक्रिया:
- 24 सितंबर 2002 को गुजरात के गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर पर दो आतंकवादियों ने हमला किया।
- शाम 4:45 बजे, दो लड़के, जिनकी उम्र 20-25 साल थी, एक सफेद कार से उतरे और गेट नंबर 3 के पास 7 फुट की दीवार फांदकर मंदिर परिसर में प्रवेश कर गए।
- आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं और ग्रेनेड फेंके, जिससे 33 लोगों की मौत हो गई और 42 घायल हो गए।
- मंदिर के सुपरवाइजर खोद सिंह जाधव ने मुख्य मंदिर का दरवाजा बंद करके कई लोगों की जान बचाई।
- तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पुजारी विश्व बिहारी स्वामी ने फोन पर हमले की जानकारी दी, जिसके बाद उन्होंने तुरंत स्टेट कमांडो फोर्स को भेजा।
2. सुरक्षा बलों की कार्रवाई:
- गुजरात पुलिस, बीएसएफ, सीआरपीएफ और स्टेट कमांडो फोर्स (एससीएफ) ने मंदिर परिसर को घेर लिया और आतंकियों को ढूंढना शुरू कर दिया।
- बीजेपी एमएलए हीरा भाई सोलंकी ने अपनी लाइसेंसी पिस्तौल से आतंकियों पर गोली चलाई, जिससे 300 लोगों को भागने का मौका मिला।
- एनएसजी कमांडोज को दिल्ली से बुलाया गया, जिन्होंने "ऑपरेशन वज्र शक्ति" शुरू किया।
- एनएसजी टीम का नेतृत्व ब्रिगेडियर राज सीतापति ने किया।
- मुठभेड़ में स्टेट कमांडो अर्जुन सिंह गामे और अल्ला रखा उनाद शहीद हो गए।
- एनएसजी कमांडो सूबेदार सुरेश चंद यादव ने एक आतंकी को मार गिराया, लेकिन खुद भी शहीद हो गए।
- सुबह 6:30 बजे तक दोनों आतंकियों को मार गिराया गया।
3. जांच और गिरफ्तारियां:
- आतंकवादियों की जेब से मिले लेटर में तहरीक-ए-कसास नामक संगठन का जिक्र था, जिसने हमले की जिम्मेदारी ली थी।
- गाड़ी के रजिस्ट्रेशन नंबर से पता चला कि गाड़ी मनसुख आचार्य के नाम पर रजिस्टर्ड थी और राजू ठाकुर नाम का शख्स उसे चला रहा था।
- पाकिस्तानी अखबार में छपी शोक संदेश से आतंकियों की पहचान हुई: मोहम्मद अमजद और हफीज यासिन, जिनका संबंध लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से था।
- गुजरात एटीएस ने 5 लोगों को गिरफ्तार किया: सलीम हनीफ शेख, अल्ताफ अकबर हुसैन मलिक, आदम सुलेमान अजमेरी, मुफ्ती अब्दुल कयूम मंसूरी और मौलाना अब्दुल अमिया।
- जम्मू-कश्मीर पुलिस ने चांद खान को गिरफ्तार किया, जिसने दावा किया कि हमला शकील और अब्दुल्ला ने किया था।
4. कानूनी कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट का फैसला:
- गुजरात पुलिस ने पोटा के तहत 6 लोगों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की।
- पोटा कोर्ट ने 2006 में 6 लोगों को दोषी ठहराया: अजमेरी, चांद खान और मुफ्ती अब्दुल कयूम मंसूरी को मौत की सजा, सलीम हनीफ शेख को आजीवन कारावास, अब्दुल अमिया को 10 साल और अल्ताफ हुसैन को 5 साल की सजा।
- 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी 6 आरोपियों को बरी कर दिया, गुजरात पुलिस की जांच में खामियों का हवाला दिया।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे और विटनेसेस के बयानों में भी कई फॉल्ट्स पाए गए।
5. सुरक्षा चूक और राजनीतिक प्रभाव:
- हमले ने गुजरात अथॉरिटीज की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए।
- आईबी ने पहले ही मंदिरों पर आतंकी हमलों की चेतावनी दी थी, लेकिन अक्षरधाम मंदिर की सुरक्षा नहीं बढ़ाई गई।
- हमले के बाद गुजरात में दंगे भड़कने का डर था, लेकिन सरकार ने स्थिति को नियंत्रण में रखा।
- तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मालदीव का दौरा रद्द कर दिया और अक्षरधाम मंदिर पहुंचे।
6. उल्लेखनीय उद्धरण:
- एनएसजी डायरेक्टर जनरल रणजीत शेखर मसा हारी का ब्रिगेडियर राज सीतापति को संदेश: "Get moving in 30 minutes."
7. तकनीकी शब्द:
- एनएसजी (राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड): भारत का एक विशेष बल जो आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए प्रशिक्षित है।
- पोटा (आतंकवाद निवारण अधिनियम): भारत में 2002 में पारित एक कानून जो आतंकवाद से निपटने के लिए बनाया गया था।
- एटीएस (एंटी टेररिस्ट स्क्वाड): आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए गठित पुलिस की एक विशेष इकाई।
- ऑपरेशन वज्र शक्ति: अक्षरधाम मंदिर में आतंकियों को खत्म करने के लिए एनएसजी द्वारा चलाया गया अभियान।
8. डेटा और आंकड़े:
- 33 लोग मारे गए, जिनमें कई बच्चे, महिलाएं और बूढ़े लोग शामिल थे।
- 42 लोग घायल हुए।
- 2 आतंकवादी मारे गए।
- 6 लोगों को पोटा कोर्ट ने दोषी ठहराया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया।
9. निष्कर्ष:
अक्षरधाम मंदिर पर हमला एक दुखद घटना थी जिसने गुजरात और पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस हमले ने सुरक्षा व्यवस्था में खामियों को उजागर किया और जांच प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने न्यायिक प्रणाली में निष्पक्षता और सबूतों के महत्व को रेखांकित किया। हमले के पीड़ितों को अभी भी न्याय का इंतजार है।
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